हनुमान जी रूद्र के 11 वें अवतार माने जाते हैं। कलयुग के प्रभाव से इस संसार की रक्षा और भक्ति की शक्ति को जागृत करने के लिए उन्हें अमरता का वरदान दिया गया था। जहाँ एक ओर ईश्वर कलयुग में प्रत्यक्ष रूप से सामने नहीं आ सकते, वहीँ हनुमान जी संसार की रक्षा के लिए सबके निकट ही रहते हैं। इस लेख में हमने हनुमान जी का सम्पूर्ण जीवन चित्रित किया है। अगर आपको कोई त्रुटी लगती है या कोई कथा छूट गयी है या फिर लेख के विषय में कुछ भी कहना चाहते हैं तो लेख के अंत में कमेंट करने का भाग है हमें वहां से सूचित करें।
इस लेख को दो भागों में तोड़ा गया है। पहले भाग में संक्षेप में हनुमान जी के विषय में बताया गया है और दुसरे भाग में उसे विस्तार दिया गया है। चूँकि हनुमान जी का चरित्र और उनका जीवन अथाह सागर के समान है इसलिए संक्षिप्त करने पर भी ये बहुत बड़ा हो गया है। धैर्य पूर्वक इस लेख का आनंद लें और हनुमान जी कि भक्ति में डूब जाएँ। दूसरों के साथ शेयर करके पुण्य प्राप्त करना ना भूलें।
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जब देवी लक्ष्मी, श्री हरी को छोड़ कर समुद्र में समा गयीं तो सारे संसार से वैभव और धन का नाश हो गया। तब नारायण ने देवताओं और दानवों को समुद्रमंथन करने को कहा और लक्ष्मी सहित अन्य कई प्रकार के रत्न निकले। समुद्रमंथन से हलाहल भी निकला जिसे शिव ने पी लिया।
समुद्रमंथन की पूर्ण कहानी पढ़ें।
दैत्यराज सुकेश के पुत्र सुमाली और उसके रिश्तेदार भाई माली और माल्यवान ने देवशिल्पी विश्वकर्मा को धमका कर स्वर्ण नगरी लंका का निर्माण करवाया। दैत्यों ने सुमाली के नेतृत्व में देवताओं के ऊपर आक्रमण कर दिया। नारायण ने देवताओं की सहायता करते हुए दैत्यों का वध किया और सुमाली को लंका छोड़ कर पाताल लोक भाग जाने को कहा। इसके बाद लंका खाली हो गयी।
हलाहल के कारण शिव के शरीर में अग्नि उत्पन्न हो रखी थी परन्तु फिर भी वो अपनी तपस्या में लीन थे। श्री विष्णु ने अग्नि का कारण पुछा तो शिव ने कहा कि ये अग्नि मेरे रूद्र अवतार की है। परन्तु ये तब तक नहीं शांत होगी जब तक विष्णु साथ नहीं देंगे। तब नारायण ने पुनः मोहिनी रूप धारण किया और शिव के साथ मिलकर एक शक्ति पुंज का निर्माण किया। वो शक्ति पुंज नाग मुनि के यज्ञ में समा गया। शिव के आदेश से नाग मुनि ने अग्नि पुंज की रक्षा की।
नारद मुनि जी पवन देव और पुंजिकस्थला के पास गए और कहा कि उन दोनों के साथ कुछ अनिष्ट घटित होने वाला है और वहां से अदृश्य हो गए। पवन देव और पुंजिकस्थला को बेचैनी होने लगी की आखिर क्या अनिष्ट होने वाला है।
जब सुमाली पातळ लोक भाग गया तो लंका नगरी खाली हो गयी। ब्रह्मा से उत्पन्न सप्त ऋषि में से सबसे प्रमुख पुलस्थ ऋषि के पौत्र और विश्रव ऋषि के पुत्र वैश्रव कुबेर ने ब्रह्मा जी का तप करके शक्तियां और पुष्पक विमान प्राप्त किया। कुबेर जो यक्षों के राजा थे उन्होंने लंका पर राज किया और पुलस्थ वंश की स्थापना की।
जब सुमाली को कुबेर के राज्य का पता चला तो वो बहुत क्रोधित हुआ। उसने अपनी पुत्री, केकसी, को विश्रव ऋषि से विवाह करने भेजा ताकि वो एक ऐसे पुत्र जो जन्म दे जो राक्षसों की भांति शक्तिशाली हो और ऋषियों की भांति शास्त्रों का ज्ञाता। केकसी ने विश्रव ऋषि से विवाह कर लिया।
नारद को मोह जाल में फसने से बचाने के लिए श्री हरी ने लीला रची और नारद जी का अपमान हो गया। क्रोध में नारद जी ने श्री हरी को श्राप दे दिया कि उन्हें त्रेता युग में वानरों की सहायता लेनी पड़ेगी।
नारद जी के श्राप की सम्पूर्ण कहानी पढ़ें।
कैकसी ने एक पुत्र को जन्म दिया जो दहाड़ते हुए रोया और फिर हंसा। उसका आकार किसी 10 वर्ष के बालक जितना था। वो बहुत शक्तिशाली था। जन्म से ही उसके 10 शीश थे इसलिए उसका नाम दशानन रखा गया।
स्वर्ग में इंद्र देव ने पवन देव और पुन्जिक्स्थला को आज्ञा दी कि वे दोनों कुछ समय के लिए साथ विहार करने जाएँ और साथ समय व्यतीत करें।
एक बार वे एक नदी में नाच-गा रहे थे और पानी से खेल रहे थे। वहीँ पर मातंग ऋषि अपनी पूजा कर रहे थे। पुन्जिक्स्थला ने गलती से पानी ऋषि के ऊपर गिरा दिया। जब ऋषि ने उन्हें वहां से चले जाने के लिए कहा तो अपने अप्सरा होने के गुमान में और चंचल स्वभाव होने के कारण उसने ऋषि का अपमान कर दिया। मातंग ऋषि ने क्रोध में उसकी चंचलता के कारण उसे बंदरिया बना दिया। पवन देव ने मिन्नतें की तब उन्होंने कहा कि इसे अब भोलेनाथ की प्रार्थना करनी होगी और वही इसका कल्याण करेंगे। वो शिव जी कि प्रार्थना करने लगी।
इन्द्रलोक में इंद्र ने पवन देव को वहां से वहिष्कृत कर दिया क्योंकि पवन देव के कारण ऋषि का अपमान हुआ और पुन्जिक्स्थला को श्राप मिला। दुखी पवन देव इधर उधर घूम रहे थे तभी नारद जी ने उन्हें शिव जी के पास जाने के लिए कहा। शिव जी ने पवन देव को कैलाश पर ही रहने कि अनुमति दी।
नाग मुनि के आश्रम में केसरी अपने शिकार को खोजते हुए पहुँच गए। नाग मुनि क्रोधित हो गए कि ऐसे पावन आश्रम में जहाँ शिव जी का शक्ति पुंज है वहां इस राजा ने जीव हत्या कर दी। नाग मुनि ने उन्हें वानर बना दिया।
नाग मुनि ने सोचा कि ये ठीक नहीं हुआ। राजा के राज्य में उनका आश्रम आता है और राजा ही पूरी प्रजा कि रक्षा और भरण पोषण करता है। एक गलती कि इतनी बड़ी सजा नहीं देनी चाहिए थी। इसलिए उन्होंने केसरी को कहा कि वो जाकर शिव जी कि आराधना करे।
केसरी ने देखा कि एक बंदरिया शिव कि प्रार्थना कर रही है। वो भी वहीँ बैठ कर प्रार्थना करने लगा।
केसरी और पुन्जिक्स्थला की प्रार्थना सुन कर शिव जी प्रसन्न हो गए। उन्होंने दोनों को वरदान दिया कि अगले जन्म में वे एक असाधारण बालक को जन्म देंगे। वो स्वयं शिव का रूद्र अवतार होगा। अगले जन्म में भी वे दोनों वानर कुल में ही जन्म लेंगे परन्तु अपनी इच्छा अनुसार रूप परिवर्तित कर सकेंगे।
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